हे अविनाशी! नाथ निरंजन…

(राग : सुणो चंदाजी! सीमंधर…/यह है पावनभूमि…)

हे अविनाशी! नाथ निरंजन… साहिब मारो…साहिबो साचो…!
हे शिववासी! तत्त्व प्रकाशी, साहिब मारो…साहिबो साचो…!

भवसमुद्र रह्यो महाभारी, केम करी तरुं हो अमट्या;
बाह्य ग्रहीने करो भवपारी… साहिब मारो0।।1।।

वामानंदन नयने निरख्या, अानंदना पूर हैये उमट्या;
कामित-पूरण कल्पतरु फलीया… साहिब मारो0।।2।।

महिमा तारो छे जग-भारी, पार्श्व शंखेश्वर तुं जयकारी;
सेवकने द्यो केम विसारी… साहिब मारो0।।3।।

माहरे तो प्रभु तुं ही एक देवा, न गमे करवी बीजानी सेवा;
अरज सुणो प्रभु देवाधिदेवा… साहिब मारो0।।4।।

सात-राज अलगा जई बेठा, पण भगते अम मनमांहे पेठा;
‘वाचक यश’ कहे नयने दीठा… साहिब मारो0।।5।।

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